📖 श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान श्रृंखला
अध्याय 2 : सांख्य योग
आज के श्लोक : 55 – 56
📝 स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के प्रथम लक्षण – इच्छाओं पर विजय और मन की स्थिरता

🪔 श्लोक 55
संस्कृत श्लोक :
श्रीभगवानुवाच –
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥55॥
📜 हिंदी अर्थ
भगवान Krishna कहते हैं –
हे Arjuna! जब मनुष्य अपने मन में उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर देता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
📚 विस्तृत व्याख्या
यह श्लोक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का पहला और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण बताता है।
👉 सामान्य व्यक्ति की खुशी बाहरी वस्तुओं, धन, पद, प्रतिष्ठा और इच्छाओं की पूर्ति पर निर्भर होती है।
👉 लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की खुशी किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं रहती।
👉 वह अपने भीतर ही संतोष और आनंद अनुभव करता है।
👉 इसका अर्थ यह नहीं कि वह संसार छोड़ देता है, बल्कि वह इच्छाओं का दास नहीं बनता।
यह श्लोक हमें सिखाता है:
- सच्ची खुशी भीतर से आती है
- इच्छाएँ जितनी बढ़ती हैं, अशांति भी उतनी बढ़ती है
- आत्मसंतोष ही स्थायी सुख का आधार है
❓ प्रश्न (MCQ)
Q1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति किसमें संतुष्ट रहता है?
A. धन में
B. परिवार में
C. आत्मा में
D. पद में
✅ सही उत्तर : C. आत्मा में
Q2. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति क्या त्याग देता है?
A. परिवार
B. कर्तव्य
C. सांसारिक इच्छाएँ
D. मित्र
✅ सही उत्तर : C. सांसारिक इच्छाएँ
🪔 श्लोक 56
संस्कृत श्लोक :
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥56॥
📜 हिंदी अर्थ
जो व्यक्ति दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में आसक्त नहीं होता तथा राग, भय और क्रोध से मुक्त रहता है, वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।
📚 विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का दूसरा लक्षण बताते हैं।
👉 दुःख आने पर वह घबराता नहीं है।
👉 सुख मिलने पर वह अहंकारी या अत्यधिक आसक्त नहीं होता।
👉 उसके मन में किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अंधा मोह नहीं होता।
👉 वह भय और क्रोध पर भी नियंत्रण रखता है।
यही मानसिक संतुलन उसे सामान्य लोगों से अलग बनाता है।
यह श्लोक हमें सिखाता है:
- दुःख में धैर्य रखना चाहिए
- सुख में विनम्र बने रहना चाहिए
- भय और क्रोध पर नियंत्रण सफलता की कुंजी है
- संतुलित मन ही सच्ची शक्ति है
❓ प्रश्न (MCQ)
Q1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति दुःख में कैसा रहता है?
A. घबराया हुआ
B. क्रोधित
C. विचलित नहीं होता
D. निराश
✅ सही उत्तर : C. विचलित नहीं होता
Q2. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति किन दोषों से मुक्त रहता है?
A. लोभ और मोह
B. राग, भय और क्रोध
C. आलस्य और निद्रा
D. धन और प्रतिष्ठा
✅ सही उत्तर : B. राग, भय और क्रोध
🔥 निष्कर्ष (Conclusion)
इन श्लोकों में श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के पहले दो महान लक्षण बताते हैं:
👉 जो अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है, वही सच्चा संतुष्ट व्यक्ति है।
👉 जो सुख-दुःख में समान रहता है, वही स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी है।
👉 बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन स्थिर मन वाला व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहता है।
🌟 आज की प्रेरणा
“सच्ची सफलता इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि मन की शांति और आत्मसंतोष में है।”
🚀 आगे क्या होगा?
अगले श्लोक (57 – 58) में
👉 श्रीकृष्ण बताएंगे कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति संसार के आकर्षणों के बीच भी स्वयं को कैसे नियंत्रित रखता है।
✅ दोस्त, कल हम स्थितप्रज्ञ के और गहरे लक्षण जानेंगे, जो जीवन को पूरी तरह बदल देने वाले हैं। 🙏📖✨
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