📖 श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान श्रृंखला
अध्याय 2 : सांख्य योग
आज के श्लोक : 57 – 58
📝 इंद्रियों पर नियंत्रण – स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की पहचान

🪔 श्लोक 57
संस्कृत श्लोक :
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥57॥
📜 हिंदी अर्थ
भगवान Krishna कहते हैं –
जो मनुष्य हर परिस्थिति में आसक्ति रहित रहता है तथा शुभ या अशुभ प्राप्त होने पर न अत्यधिक प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
📚 विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का एक और महत्वपूर्ण गुण बताते हैं।
👉 सामान्य व्यक्ति अच्छी घटना होने पर बहुत अधिक खुश हो जाता है और बुरी घटना होने पर दुखी या क्रोधित हो जाता है।
👉 लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जीवन की हर परिस्थिति को संतुलित भाव से स्वीकार करता है।
👉 वह सफलता मिलने पर अहंकारी नहीं बनता और असफलता मिलने पर निराश नहीं होता।
👉 उसका मन परिस्थितियों का दास नहीं बनता।
यह श्लोक हमें सिखाता है:
- सफलता में विनम्र रहना चाहिए
- असफलता में धैर्य रखना चाहिए
- हर परिस्थिति अस्थायी होती है
- मानसिक संतुलन सबसे बड़ी शक्ति है
❓ प्रश्न (MCQ)
Q1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति शुभ-अशुभ मिलने पर कैसा रहता है?
A. बहुत उत्साहित
B. बहुत दुखी
C. संतुलित
D. क्रोधित
✅ सही उत्तर : C. संतुलित
Q2. किसकी बुद्धि स्थिर कहलाती है?
A. जो हर बात पर क्रोधित हो
B. जो सफलता में घमंड करे
C. जो शुभ-अशुभ में समभाव रखे
D. जो हमेशा दुखी रहे
✅ सही उत्तर : C. जो शुभ-अशुभ में समभाव रखे
🪔 श्लोक 58
संस्कृत श्लोक :
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥58॥
📜 हिंदी अर्थ
जब मनुष्य कछुए की तरह अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
📚 विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण एक सुंदर उदाहरण देते हैं।
👉 जैसे कछुआ खतरा देखकर अपने हाथ-पैर और सिर को अपने कवच के अंदर समेट लेता है।
👉 उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति अपनी इंद्रियों को गलत आकर्षणों और विषयों से नियंत्रित कर लेता है।
👉 इसका अर्थ यह नहीं कि वह संसार छोड़ देता है, बल्कि वह अपनी इंद्रियों का स्वामी बन जाता है।
👉 जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और शांति प्राप्त करता है।
यह श्लोक हमें सिखाता है:
- आत्मसंयम सफलता की कुंजी है
- इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है
- बाहरी आकर्षणों में बहना नहीं चाहिए
- विवेकपूर्ण जीवन जीना चाहिए
❓ प्रश्न (MCQ)
Q1. श्रीकृष्ण ने किस जीव का उदाहरण दिया है?
A. सिंह
B. हाथी
C. कछुआ
D. घोड़ा
✅ सही उत्तर : C. कछुआ
Q2. कछुए के उदाहरण से क्या शिक्षा मिलती है?
A. तेज दौड़ना
B. शक्ति बढ़ाना
C. इंद्रियों को नियंत्रित करना
D. युद्ध करना
✅ सही उत्तर : C. इंद्रियों को नियंत्रित करना
🔥 निष्कर्ष (Conclusion)
इन श्लोकों में श्रीकृष्ण हमें बताते हैं:
👉 स्थितप्रज्ञ व्यक्ति सफलता और असफलता दोनों में संतुलित रहता है।
👉 जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लेता है, वही सच्चा ज्ञानी बनता है।
👉 जीवन में शांति और सफलता पाने के लिए आत्मसंयम और समभाव अत्यंत आवश्यक हैं।
🌟 आज की प्रेरणा
“जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को जीत लेता है, उसे संसार की कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती।”
🚀 आगे क्या होगा?
अगले श्लोक (59 – 60) में
👉 श्रीकृष्ण बताएंगे कि केवल बाहरी नियंत्रण पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन का नियंत्रण भी क्यों आवश्यक है।
✅ दोस्त, कल हम जानेंगे कि मनुष्य की इंद्रियाँ कितनी शक्तिशाली होती हैं और उन्हें कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। 🙏📖✨
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